“Some one had said “Life is not same for all”.
ट्रेन में बैठ कर मैं खिड़की से बहार देख रहा हूँ, पेड़ों को. कहीं एक लम्बी कतार में, कहीं एक झुरमुट में, कहीं कोई अकेला खड़ा हुआ एक पेड़, वीराने में ऊसर जमीन पर खड़ा हुआ एक अकेला पेड़.
इन पेड़ों को देख कर मुझे यह लगता है की कितनी समानता है इन पेड़ों और मनुष्य के जीवन में. कुछ बड़े, कुछ छोटे, कुछ पेड़ जो बढ़ते-२ अचानक ही किसी कारणवश रुक गए. जिन्हें आप जब भी देखिये आप को लगेगा की इनमे कुछ पत्तियां कुछ टहनियां या कुछ शाखाएं और आएगी. जिन पेड़ों में यह टहनियाँ, शाखाएं और पत्ते आ जाते हैं वो एक बड़े से वृक्ष का रूप ले लेते हैं जिसे आप दूर से ही पहचान सकते है, लगभग सभी वृक्षों से अलग बड़ा, सुन्दर, अपने आप में सम्पूर्णता का अहसास करता हुआ.
आप को कभी ऐसा नहीं लगता की प्रत्येक (लगभग) इंसान के वही दो हाथ, दो पैर, एक चेहरा जिसपर लगी दो आँखें, एक नाक, एक मुंह, दो कान और सिर पर बालों का एक गुच्छा लेकिन इन सब के बाद भी हम देखने में एक दूसरे से कितने अलग है. ऐसा ही है पेड़ों के साथ, एक ही तरह के आम के पेड़, नीम के पेड़ लकिन आपस में देखने में अलग अलग.
जैसा की मैं कह रहा था की हमारा जीवन इन पेड़ों के जीवन जैसा ही है. कुछ पेड़ एक कतार में ,संकेत हैं उनका जो एक सुव्यस्थित जीवन व्यतीत कर रहे है, समाज के बनाए हुए मापदंडों पर, देखने में उसी कतार की तरह सुन्दर, सुव्यस्थित, एक दुसरे के सहयोग को तत्पर दिखाते हुए समाज और स्वयं की उन्नति की ओर प्रयत्नशील.
दूसरे पेड़ों के वो झुण्ड जो अपने आप में ही होड़ लगाते हुए दिखते हैं. एक दूसरे से धुप पाने की होड़, पानी की होड़, मिटटी की होड़. यह मुझे काफी हद तक समाज का आईना लग रहा है. मुझे ऐसा लगता है जैसे कतारें मुड कर झुण्ड का रूप लेती जा रही हैं जिनका केवल एक ही उद्देश्य है स्वयं का विकास करना उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता की उनके इस होड़ में अन्य का क्या होगा.
तीसरा वो अकेला खड़ा पेड़ एक सुनसान वीराने में, बंजर हो चुकी जमीन पर शायद वह उस झुण्ड में से बचा पेड़ हो जिसने बाकी सभी के हिस्से का पानी, मिटटी, धूप ली और आज अकेला खड़ा है उस वीराने में जैसा लगता है वो ढूंढ रहा है किसी को अपनी आप-बीती या अपनी विजय गाथा सुनाने के लिए. लेकिन उसे सुनने वाला वहां कोई भी नहीं है सिवाए उन प्राणहीन पत्तों के जो कभी उसी के रहे होगे, उन तिनको के जो की संभवत: कहीं और से उड़ कर आए होगे और उन घासों के जो पानी के इन्तजार में इतनी सूख चुकी है की उनमे जीवन का कोई चिन्ह ही नहीं दिखाई देता.
कुछ पेड़ जो बढ़ते हुए रुक गये, जिनके एक पूर्ण वृक्ष होते हुए भी उनमे कुछ कमी रह गयी है. यह काफी कुछ वैसा ही प्रतीत होता है जब एक वृद्ध अपनी बीती हुई जिंदगी के बारे में सोचता है और उसे कुछ न कुछ कमी जरूर दिखाई देती है जो की उसे जीवन की सम्पूर्णता को अपूर्ण जीवन की ओर धक्का देती है. कुछ प्रसंगों में हम इस पेड़ को अपने जीवन से इस प्रकार भी जोड़ सकते हैं, जिस प्रकार आप अपना लक्ष्य अपने ठीक सामने देखते है परन्तु अचानक ही कुछ परिस्थितियां ऐसी बनती है की वह लक्ष्य आप से दूर होता प्रतीत होता है, वही लक्ष्य जो कुछ के लिए उनके जीवन का उद्देश्य है, वही लक्ष्य जिसके सपने देखते हुए आप प्रत्येक सुबह उठते हैं और उसी की सुनहरी कल्पना में आप का दिन भी बीत जाता है. वही लक्ष्य आज आपके सामने आ कर भी आप से दूर जा रहा है, वही लक्ष्य जिसे आपने सपने में देखा था आज प्रत्यक्ष में आप के सामने है. कुछ पल पहले तक आप को लगता था कि बस अगले ही पल आप उसे पा लेंगे, लेकिन अब वो ही लक्ष्य आप से दूर जा रहा है दूर और आप को नहीं पता कि ये लक्ष्य को पाने का अवसर आपके जीवन में फिर कब आएगा.., आएगा भी या नहीं.
अंत में वह पेड़ जो अपने आप में सम्पूर्ण है सुन्दर है विशाल है, यह शायद उस व्यक्ति कि प्रतिबिंबित करता है जिसने या तो हर वो लक्ष्य पा लिया जो उसने अपने लिए निर्धारित किया था या तो उसके जीवन में कोई लक्ष्य ही नहीं है वह मुक्त हैं सभी सामाजिक बड़ों से , समुद्र के ऊपर बहती हुई उस हवा जैसे जो बहती रहती है, कभी किसी दिशा में तो कभी किसी दिशा में.
खैर ट्रेन अब आगे निकल आई है और उन पेड़ों कि कतारों, झुंडों और उस अकेले पेड़ कि जगह कंक्रीट के जंगल ने ले ली है. शायद यह कोई शहर है, यहाँ भी कुछ अकेले खड़े पेड़ दिख रहे है लेकिन ये उनमे से कोई भी नहीं है जिनके बारे में मैंने आपको अभी बताया है….

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