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कुछ लिखूं by atul singh

written by atul singh, who joins the writing team for my blog for guest articles, he is one of the guys whose thought flow is really amazing, read it to realize it. this is his first post on my blog.

कुछ लिखने का मन करता है लेकिन क्या लिखूं? किसपर लिखूं? लिखने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है विषय की, लेकिन सच बताऊँ यही तो नदारद है, कम्बक्त मिल जाए तो मै भी कुछ लिख लेता. क्या पता शराब के बारे में कुछ लिखने बैठता और मै भी “मधुशाला” लिख देता. लेकिन ये विषय कहाँ से लाऊं. हालांकी मै एक ऐसे देश में विराजमान हूँ जहाँ विषयों की कोई भी कमी नही है.

जी नहीं मै अमेरिका, पाकिस्तान या अफगानिस्तान की बात नहीं कर रहा हूँ ,मै तो बात कर रहा हूँ “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा” माफ़ कीजिएगा ये लाइन मैंने नहीं लिखी ये तो “इकबाल साहब” की लाइन है.मै तो हिंदोस्ता लिखता ही नही ,नहीं तो क्या पता की मुझे हिंदुत्व का समर्थक मान कर सरकार मेरे पीछे पड़ जाती | भाई भारत में तो धर्मं निरपेक्षता का एक ही मतलब है “एंटी हिन्दू “|

ख़ैर मै यहाँ तत्कालीन भारत एवं उसकी समस्यायों पर नहीं लिखना चाहता, ये तो हमारे देश के प्रत्येक चाय की दुकान ,केशकर्तनालय  (मै यहाँ ‘नाई की दुकान’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहूँगा  क्यूंकिइससे जातीवाद फैलता है) और संसद में चर्चा का विषय रहती है |माफ़  करें परन्तु मै हमारी संसद या विधान सभा एवं वहां  के बाशिंदों की तुलना किसी भी कोंड़ से चाय की दुकान ,केशकर्तनालय एवं वहां  के लोगों से नहीं कर रहा हूँ मै अपने देश की एक सम्मानित एवं स्वाभिमानी प्रजाति का अनादर नहीं कर सकता | जी हाँ ,आपने बिलकुल सही सोचा यह सम्मानित एवं स्वाभिमानी प्रजाति चाय की दुकान केशकर्तनालय में पाई जाती है |

लिखने के लिए राजनीति एवं राजनीतिज्ञ, जिन्हें अब नेता कहा जाता है हमारे देश का सर्वप्रिय विषय है | इसपर लिखने के लिए आपको केवल लिखना आना चाहिए और आपको इस भारत देश जन्म लेना पड़ेगा, बाकि आप स्वयं से कुछ भी लिखो सब राजनीति में मिल जायेगा और यदि आप कोई आदर सूचक शब्द  (जिसे जन सामान्य की भाषा में भद्दी गाली कहा जाता है ) का प्रयोग करते है तो वह किसी न किसी नेता के चरित्र पर चिरतार्थ हो ही जाएगी |परन्तु समस्या ये है की राजनीति या राजनीतिज्ञों पर लिखना तो समय,स्याही और कागज तीनों की बर्बादी है |
हालाँकि लिखने के लिए भारतीय रेल एवं उसकी सुविधाए प्रमुखतः खाद्य पदार्थ और उसमे भी चाय जिसके मूल्य एवं वाह्य सज्जा को छोड़ कर विगत दशकों में उसके स्वाद में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है (ये वैसी ही वाहियात है जैसी १० वर्ष पहले थी) परन्तु सरकार के विरुद्ध लिखना किसी भी समय विशेष पर देशद्रोह में परिणित हो कर मेरे लिए मुसीबत पैदा कर सकता है |

लिखने के लिए तो गरीबी भी एक गरीब किन्तु अच्छा विषय है लेकिन यदि उसपर हमारे नेता ही लिखे (लिखवाए) या बोले तो अच्छा है | वैसे भी मै नेताओं के मुह से बात और जानवरों के मुह से खाना नहीं छीनता| मै यहाँ मेनका गाँधी से माफ़ी चाहूँगा परन्तु मै यह भी साफ़ कर देना चाहूँगा की मैंने किसी भी जानवर की तुलना नेताओं से नहीं की है | मै इतना बेगैरत नहीं हूँ की बेजुबानो के बारे में कुछ भी गलत लिखूं या बोलूं |

लेकिन इतनी सारी दिमागी कसरत के बाद भी मेरी समस्या वहीँ की वहीँ है – आखिर मैं लिखूं किस विषय पर ,भारतीय फिल्मों के बारे में मै लिख नहीं सकता क्यूंकि वो पहले से ही कहीं और से लिखी होती है

(अधिकांशतः) और जो कहीं और से नहीं लिखी होती है उन्हें कोई (अधिकांशतः) देखना या लिखना पसंद नहीं करता|
मैं लिखूं किस पर “युवा वर्ग के सामने समस्याएँ ” यह विषय अच्छा तो है परन्तु इस पर बहुत ही भरी मात्रा में साहित्यिक कार्य चल रहा है | आप को किसी भी किताब की दूकान (अधिकांशतः रेलवे स्टेशन एवं बस स्टैंड) पर इस विषय से सम्बंधित बहुत सी किताबें मिल जाएगी | इन्हें कुछ लोग खरीदते भी है परन्तु जिस प्रकार युवाओं के सामने समस्याएँ बढती जा रही है उसी प्रकार खरीदे जाने पर भी इन किताबों की संख्या  ,तो इस प्रकार ये विषय भी गया हाथ से |

बच्चों के बारे में लिखने का कोई तर्क नहीं बनता क्यूंकि आज के परिवेश में बचपन इतनी तीव्रता से समाप्त हो रहा है की इसे भी “save our tiger ”  की तरह से ही प्रचारित करना होगा |

शिक्षा पद्धति के बारे में मै कुछ नहीं लिख सकता क्यूंकि यदि शिक्षा पद्धति वाकई इतनी अच्छी होती तो मै लिख नहीं रहा होता |

भारत-पाक संबंधों के बारे में भी मै नहीं लिख सकता क्यूंकि उसपर समाचार पत्रों का एकाधिकार है वैसे भी मै किसी के पेट पर लात नहीं मारता |
अपने जीवन के बारे में लिखना भी एक अच्छा विषय है परन्तु केवल तभी तक जब तक आप कोई प्रसिद्ध व्यक्ति ये नेता हो अन्यथा ये भी व्यर्थ है क्यूंकि आत्मकथा का तात्पर्य ही यही होता है की अपनी आत्मा का गला दबा कर अच्छी- अच्छी कहानियाँ लिखो जिसमे अधिकांशतः नायक आप ही है |

लगता है कुछ लिखना मेरे लिए उतना ही दुष्कर है जितना की कुछ करना लेकिन यदि मुझे कभी कोई विषय मिला तो मै ऐसा लिखूंगा की पूरी दुनिया पढेगी और कहेगी वाह !क्या लिखा है |

वैसे इतनी माथापच्ची के बाद मुझे एक शीर्षक मिला है ” लिखने को विषय नहीं न करने को कुछ काम, तो अब चलो भाईओं हम करते है आराम “|

atul singh, 17 may 2010, 22:30 ist

disclaimer : i would like to point out that all views expressed in this column are those of the writer and i might not totally and necessarily agree with them.  any credit positive or negative must be given to him.

13 comments to कुछ लिखूं by atul singh

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